कई अवसर गवाने का नतीजा है भारत-चीन सीमा विवाद

भारत और चाइना के बीच चल रहे नोक झोक में हाल ही में चाइना के ‘मिनिस्ट्री ऑफ़ फॉरेन अफेयर्स’ ने भारत को डराने की देते हुए यह कह डाला कि भारत को 1962 भूलना नहीं चाहिए| ठीक वैसे ही जैसे हम पाकिस्तान को 65, 71 और 99 की यादें दिलाते है| हमारी सरकार के वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी ने वही जवाब चाइना को दिया जो पाकिस्तान अब तक हमें देता रहा है| मतलब कि समय बदल चूका है, तब और अब में फर्क है| बातें दोनों ही सही है| भारत आज ना तो 1962 जैसा रहा और नाही पाकिस्तान 1965 जैसा| भारत और चाइना के बीच रिश्तों का क्या पैटर्न रहा है| इसे जानने के लिए हमें इतिहास की ओर रुख करना पड़ेगा| 1950 के दशक में तिब्बत पर हमला करके कब्ज़ा करने के बाद ‘पीपल रिपब्लिक ऑफ़ चाइना’ के फाउंडिंग फादर माओ जिदौंग ने घमंड में कहा था कि “तिब्बत चाइना की हथेली है, लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और नेफा (अरुणाचल प्रदेश) उस हथेली की पांच उँगलियाँ है| इतिहास में जो गलती हमने कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ किया था वही गलती हमने चाइना के साथ भी किया|

चाइना से सीमा विवाद सुलझाने के कई मौके भारत के पास आए लेकिन अफ़सोस की हम उस मौका का पूरा पूरा सदुपयोग नहीं कर पाए| ठीक वैसे ही जैसे भारत के पास कश्मीर मामला सुलझाने के कई मौके हमने खो दिए थे| भारत 1947 में आजाद हुआ और उसके ठीक दो साल बाद चाइना एक साम्यवादी देश बना| दोनों देशों के सफ़र लगभग एकसाथ शुरू हुआ| भारत ने चीन को एक देश के रूप में मान्यता भी दे दिया| तिब्बत पर हमला करके कब्ज़ा करने के बाद चाइना तिब्बत पर अपना हक़ जताने लगा| जबकी चाइना और तिब्बत से कोई ख़ास सरोकार रहा ही नहीं है| वहाँ पर ज्यादातर लोग बौध धर्म को मानाने वाले है| ना सिर्फ धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी तिब्बत का भारत के साथ रिश्ता रहा है| भारत ने ऐसी कोई पहल नहीं की| इसपर मुझे भी कोई एतराज नहीं| मुझे एतराज इस बात की है कि जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल में विदेश मंत्रालय को अधिकारिक तौर पर संदेश जारी करके चाइना का तिब्बत पर आक्रमण को सही ठहराया गया था| अगर पुरानी इतिहास के आधार पर उन्होंने ऐसा ठहराया होगा तो उन्हें उसी इतिहास के आधार पर पाकिस्तान जैसे मुल्क बनाने की बातों पर भी सहमत नहीं होना चाहिए था|

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मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने की कोई जल्दबाजी करनी चाहिए थी| चीनी ताकत के भयभीत नेहरु बार बार संसद में यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि भारत को चीन से रिश्ते पुख्ते करने में ही भलाई है| मै भी इस बात से सहमत हूँ| लेकिन किसी भी कीमत पर नहीं| जब चाइना ने तिब्बत पर कब्ज़ा किया था तब पूरी दुनिया ने इसका बहिष्कार किया था और किसी ने इसकी मान्यता नहीं दी थी| ऐसे में भारत को जल्दबाजी करने की शायद कोई खास जरूरत नहीं थी| पंचशील जैसे समझौते तो हुए लेकिन इसमें बातें सारी ख्वाबी पुलाव जैसी और एकतरफा थी| ठीक ऐसा ही समझौता हमने इंदिरा गाँधी के समय देखा था जिसमे मैदान में युद्ध जितने के बाद भी टेबल पर जाकर हार गए थे| जिसे शिमला समझौता के नाम से जाना जाता है| इसी पंचशील समझौते के तहत भारत पहला देश था जिसने तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में स्वीकारा| इसके बावजूद की धर्मगुरु दलाई लामा लगातार भारत से अनुरोध करते रहे थे|

डिप्लोमेट्स और प्रधानमंत्री का आना जाना लगा रहता था| बातें होती तो थी लेकिन सीमा विवाद पर बातें नहीं हो पाती थी| ऐसे में जब कांग्रेस में जितना भी दक्षिणपंथी नेता (पन्त से लेके जे. बी. कृपलानी तक) थे, वो सब सवालें करते तो थे लेकिन जवाब वही आता था कि जब सीमा समझौते की पहल चाइना कर ही नहीं रहा है तो भारत क्यों करे? चाइना चुप क्यों था? क्युकी वो समय वैसा था की चाइना पर तिब्बत को लेकर बहुत दबाव था| बाद में जब दबाव से बाहर आया तो भारत पर शक्ति परीक्षण कर पूरी दुनिया को अपनी ताकत का झांकी पेश कर डाला| उन दिनों भारत ने इसका समर्थन कर उनके आत्मविश्वास में चार चाँद लगा दिया और इसके एवज में कुछ मिला भी नहीं| चुकी नेहरु मैकमेहन रेखा को अंतराष्ट्रीय सीमा मानते थे और यही कारण था कि वो चाइना से बात तक नहीं करना चाहते थे| या तो वे ‘पीपल रिपब्लिक ऑफ़ चाइना’ के फाउंडिंग फादर माओ की बातें भूल गए थे या फिर कुछ अनहोनी न हो इसकी वजह से बातें टालते थे|

भारत अपनी सुरक्षा के नजर से बिल्कुल दखल दे सकता था| क्युकी तिब्बत को अपने में शामिल करने के बाद भारत के साथ लगने वाला चीन का सीमा बढ़ चूका था| हमारे लिए यह खतरे का विषय था| बाद में ऐसा हमने देखा भी है कि श्रीमती गाँधी के कार्यकाल में जब भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर, बाग्लादेश में किए जा रहे पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचार से प्रभाव पड़ रहा था तब हमने दखल दिया भी था और बांग्लादेश को आजाद भी करवाया था| बाद में चाइना की तरफ से चाऊ एन लाइ की चिठ्ठी नेहरु के नाम से आई| जो डर था वही हुआ| उसमे दो-तीन बातें लिखी थी| पहला कि मैकमेहन रेखा ब्रिटिश शासन द्वारा थोपी हुई रेखा है, यानी की मैकमोहन लाइन से चाइना सहमत नहीं है| दूसरी बात भारत के चालीस हजार वर्गमील की जमीन पर अपना दावा करने लगा, यानी की जिस खतरे की उम्मीद की जा रही थी वो सामने दिखने लगा था| तीसरी बात ये थी कि चाइना का कहनाम था कि भारत ने उसका अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया|

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उसी समय जवाहर लाल नेहरु ने अपना चर्चित भाषण दे डाला| वो चाइना द्वारा दावा किया गया भारतीय जमीन पर समझौता करने को भी तैयार हो गए थे| उनका कहनाम था कि भारत की यह बेवकूफी होगी कि भारत चालीस हजार किलोमीटर बंजर जमीन के लिए चाइना से रिश्ते ख़राब करे| मतलब बिल्कुल साफ़ था जवाहर लाल नेहरु बहुत ही जल्दबाजी में बातें समेटना चाह रहे थे| उसी समय सांसद महावीर त्यागी ने अपना टोपी उतार कर उनकी बातों का विरोध किया और कहा कि मेरे सिर पर बाल नहीं है इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मेरे सिर कलम कर दिया जाए| चाहिए ये था कि अपने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चाइना को अपने देश से लगने वाली बाउंड्री बढ़ानी ही नहीं चाहिए था| यानी की तिब्बत का हमें खुलकर समर्थन करना चाहिए था अगर नहीं भी किया तो कम से कम चुप रहना चाहिए था बजाए तिब्बत को चीन के हिस्सा के रूप में खुलकर मान्यता देने की| अगर मान्यता दिया भी तो इसके एवज में सीमा समझौते को सुलझा देनी चाहिए थी| कहीं भी भारत को मुनाफा नहीं हुआ उलटे हमें 1962 जैसे लड़ाई झेलनी पड़ी और अपने अपने भावी पीढ़ी के लिए नासूर बना दिया गया|

ऐसी भी बातें नहीं थी कि नेहरु चिंतित नहीं थे| वो चिंतित थे लेकिन ज्यादातर निर्णय वो खुद लेते थे| चर्चा ना के बराबर होती थी| मुझे ख़ुशी इस बात की है कि वर्त्तमान की सरकार सीमा और सुरक्षा को लेकर चिंतित है| अभी जो हाल में दिक्कत है वो बिलकुल इतिहास से सामानांतर है लेकिन भारत के रुख को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि भारत ने कुछ सबक जरूर लिया है| चाइना अभी जहाँ सड़क निर्माण कार्य कर रहा है वो भारत की जमीन नहीं है| बल्कि वो एक विवादित जमीन है भूटान और चाइना के बीच की| अगर आप एक बार माप देखेंगे तो पाएँगे कि भारत का सिक्किम, भूटान और चाइना का जो ट्राईजंक्शन है उसके पास में वो निर्माण कार्य चल रहा है जो भारत की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है| यदौंग तक अगर सड़क और रेलवे का निर्माण होता है तो आने वाले समय में भारत के लिए बहुत ही बड़ा खतरा है| क्युकी भारत उत्तरपूर्व के साथ एक ‘चिकन नैक’ से जुड़ा हुआ है| कल गए अगर वहाँ हमला होता है और भारत का सप्लाई लाइन टूटता है तो उत्तरपूर्व हमारे लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय बन सकता है| इतिहास में भी ऐसा ही हुआ था जब अक्साई चीन से होकर सिंग क्यांग से तिब्बत तक निर्माण कार्य करने लगा था जिसकी वजह से हमें अपने हाथ से गवाना पड़ा था|

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इसलिए मुझे लगता है कि सरकार को ऐसे ही सख्ती से चाइना की हरकतों का विरोध करनी चाहिए| यहाँ तक चाइना हिन्दमहासागर में भी अपना पैर धीरे धीरे फैला रहा है| चाइना का एक नीति रही है पहले फाइनेंस करो, कर्ज में डुबो दो फिर पोर्ट पर अपना अधिकार जमाकर व्यापार करो और भारत के सुरक्षा को चुनौती भी दो| इसी प्रक्रिया में चाइना ने पाकिस्तान से ग्वादर पोर्ट पर फाइनेंस करके दबदबा बनाया हुआ है| ऐसे ही श्रीलंका की पोर्ट हैमबनटोटा को फाइनेंस किया हुआ है| एक तरह से देखे तो भारत को घेर भी रखा है समुंद्री रास्ते और व्यापार भी सुदृढ़ कर रखा है| इसे एक नए प्रकार के उपनिवेशवाद के नाम से जाना जाता है जो चाइना फ़िलहाल शक्तिप्रदर्शन के लिए कर रहा है| हालाँकि भारत ने भी इसके एवज में इरान के चाहबहार पोर्ट पर फाइनेंस करके व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है| उत्तरपूर्व को अपने साथ बनाए रखना और उसके लिए सुरक्षा प्रदान करना भारत के लिए वाकई एक बड़ी चुनौती से कम नहीं है|

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