न्याय कवना किमत प ? (भोजपुरी)

वोइसे देखल जाव त न्यायिक प्रक्रिया भारत में सबसे ज्यादा पारदर्शी अउरी जवाबदेही बड़ुए. लेकिन चुनौती के तरफ झाकल जाव त मानी कि ओवरफ्लो हो रहल बा. हम कहाँ जाई विदेशिक मुद्दा के रखे एह से बेहतर बा कि सबसे पाहिले गाँव से शुरू करतानी. अगर कवनो केस एगो मध्यवर्गीय आम ग्रामीण के लड़े के होखे त सबसे पहिला तत्व आई वकीलवन के महंगाई जवना प कोई खास लगाम नइखे आजो. जबकि दूसरा तरफ संविधान के अनुच्छेद 14 एह बात के दावा करेला कि हर शख्स के समान न्याय पावेके पूरा अधिकार बा. हजारो गो केस बाड़ी सन देश में जहाँ आपन कमाई के हक मांगे खातिर भी लोग के कई वर्ष तक कोर्ट के चक्कर लगावत बित जाला तबो कोई के मिल पावेला कोई के ना.

आर्थिक मदद जरूरतमंद आदमी के “लीगल सर्विसेज अथॉरिटी एक्ट” मुफ्त वकील प्रदान भी करवावे के सोचल गईल ताकी न्यायिक असमानता कम कईल जा सके, लेकिन वोहिजो बहूत चुनौती देखे के मिलल. सबसे पहिला अउरी बड चुनौती की केतना लोग के नॉलेज बा एह कानून के बारे में ? 1987 में बनल कानून आज 27 वर्ष लगभग होखे जा रहल बा फिर भी बहूत लोग अछूता बा वोहिजे दूसरा दने 3 साल पुरान राजनितिक पार्टी “आप” लगभग काफी लोग अवगत हो गईल बा उहे नाही खासी के अपडेट गाँव-गाँव तक रहेला तब एगो प्रश्न खड़ा होता काहे ? एक बेरी मान लिहल जाव कि सरकार सक्रिय नइखे त हजारो NGO और तमाम तरह के तामझाम भी असफल कैसे हो सकेला ?

दुसरका चुनौती बा मुफ्त वाला वकील के वकालत में गुणवत्ता में कमी. इ मसला ठीक ओकरे लेखा बा मानी तेज तरार इंजिनियर के जब प्राइवेट में लाखो के सैलरी मिलता त सरकारी बोझ बनके हजारो रुपया के सैलेरी के बीच झक काहे मराई. हमरा समझ से एकर इ उपाय हो सकेला जईसे मेडिकल में MBBS वालन खातिर PHC (प्राइमरी हेल्थ सेंटर) में तजुर्बा लेल जरूरी बा वैसही हर वकील के एगो लाइन खिचल जा सकेला कि तोहरा साल में हतना केस “लीगल सर्विसेज अथॉरिटी एक्ट” के तहत मुफ्त में लड़े के पड़ी, एह से होई का असंतुलन जवन बनता ओकरा के कुछ हद तक संतुलित कईल जा सकेला.

हम इ नइखी जानत कि कतना सही बा हमार सुझाव लेकिन चर्चा वाला बिंदु निश्चित रूप से हो सकेला. ढेर गरीब आदमी एह सब के चक्कर में उलझ के रह जाला. कहाँ से पईसा लाओ ग्रामीण आदमी खेती के उहे दीन दशा रहेला अउरी बाच गईल बाप के बपौती खेत, उहे सोना के अंडा देवे वाला मुर्गी ह किसान के जवना प ओकर लईका के भविष्य लउकेला अउरी ओही उपज प बिटिया के इज्जत. अगर गलती के मुर्गी काट के पैसा देही सामान्य न्याय पावे खातिर ओकरा के शर्मनाक बात कुछ ना हो सकेला सरकार अउरी पूरा तंत्र के खातिर.

एगो अउरी बात इ बा कि न्याय जवन होला उ वकील के वकालत के शैली अउरी तथ्य प निर्भर करेला एहसे से जजमेंट प ऊँगली उठावल बईमानी होई. एहिजा दू गो बात निकल के आवता पहिला अगर राउर तथ्य वाजिब होई त राउर वकील ओकरा के अपने से बेहतर तरीका से रिप्रेजेंट कर सकेला अउरी सत्य के जीत हो सकेला. दूसरा तरफ इ भी संभव बा विपक्ष के तथ्य हल्का होते हुए भी वकालत के शैली केस रउरा के हरा भी सकेला.

इतिहास उठा के देखम त सभ बड बड नेता लोग के बचावे के काम कईले बाड़े राम जेठ मलानी, एकर माने इ बिल्कुल नइखे कि नेताजी लोग जेकरा के बेल दीवाईले बाड़े उ निर्दोष बा, एहिजुगा वकालत के शैली केस के शक्ल बदल देला. हमनी लेखा आदमी खातिर सपना ही हो सकेला राम जेठ मलानी जइसन वकील के आपन केस के बारे में सोचलो. हमरा याद आवता बहूत पाहिले कही पढले रही शाहिद आजमी  के बारे में, एगो अच्छा अउरी तेज तरार वकील जवना के दुनिया ईगो दबंग मानवाधिकार वकील के आवाज समझत रहे.

देश में एगो बात आम होला कवनो घटना घटला के बाद अनैतिक घटना घटेला, जईसे मुंबई हमला भईल ओकरा बाद कई गो निर्दोष मुस्लमान के बिना मतलब अरेस्ट करके भारतीय फॉर्मेलिटी मुकम्मल कईल जाला. खैर अइसन कौ गो केस बिना पईसा के लड़ के जितवले रहन अउरी बेकसूर के न्याय दिलईले रहन लेकिन 2010 में उनकर हत्या हो गईल उनके ऑफिस में. एह तरह के भी प्रभाव के सम्भावना बनल रहेला. एगो अउरी बड चुनौती बा आरोपी से सम्बंधित उदाहरन लेके समझल जा सकेला शबाना आदम जेकरा के 11 साल बाद रिलीज़ कईल गईल अक्षरधाम केस से जेकरा के युही कवनो दोसर बात के भड़ास निकाले खातिर अरेस्ट कईल गईल रहे.

शबाना आलम जेल में रहत समय किताब भी लिखले बाड़े जवना में उ आपण पीड़ा व्यक्त कईले बाड़े. खैर मुद्दा के बात इ बा 11 साल जइसन लम्बा समय लाग गईल ट्रेल में फिर निकलल निर्दोष. फिर एहिजा प्रश्न उठता के जिम्मेवार बा ओह पीड़ा के ? जीवन शैली भी प्रभावित रहल 11 साल तक ओह आम आदमी के. परिवार प कोसल सामाजिक ताना ? बच्चा के भविष्य ? लईका लईकिन के  शिक्षा ? बा कवनो मुआवजा के प्रावधान अइसन निर्दोष खातिर ? एह तरह के सैकड़ो चुनौती बा देश में न्यायिक प्रक्रिया में जवना के सुधरल जरूरी बा एगो अच्छा अउरी स्वस्थ्य लोकतंत्र खातिर.

See also  का वीर सावरकर के 'भारत रत्न' मिले के चाही? (भोजपुरी)

Spread the love

Support us

Hard work should be paid. It is free for all. Those who could not pay for the content can avail quality services free of cost. But those who have the ability to pay for the quality content he/she is receiving should pay as per his/her convenience. Team DDI will be highly thankful for your support.

You can make secured payment by any mean from here

Leave a Comment

error: Content is protected !!