होर्डिंग की होड़ में टूटता मैनिफेस्टो का जोड़

एक बड़ी  ही सत्य कहावत है कि समय के साथ सब कुछ बदलने लगता है, ठीक उसी प्रकार राजनीति  भी समय के साथ साथ बदलने लगती है, ये कहाँ तक सही है या कहाँ तक गलत  ये  भी एक चर्चा का विषय है | आजादी के तुरंत  बाद के राजनीति  को भापिए, उसके बाद के दशकों  को निहारिए और आज की राजनीति  का मूल्यांकन कीजिए तो  बहुत  ज्यादा असमानताएँ दिखाई देंगी | लेकिन एक चीज है जो कांस्टेंट रही है वो ये कि जब जब किसी आन्दोलन की बीज बोई गई है, तब तब उसका अंत आन्दोलन के रूप में नहीं बल्कि एक अलग राजनीतिक ध्रुव या समूह   के रूप  हुई है|

उदाहरण में जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन ले लीजिए, दक्षिण भारत में श्री रामलू के  आमरण अनशन को  ले लीजिए या फिर अन्ना जी का ले लीजिए | इन तीनों दशाओं  में एक बात सामान्य रही है कि तीनो लोगो को सत्ता नसीब नहीं हुई है जिसमे नेहरु जी कार्यकाल में श्री  रामलू जी ने तो अनशन  के दौरान ही दम तोड़ दिया था, वैसे तीनों लोगों  को सत्ता से खैर ख़ास प्रेम भी नहीं रहा था | अन्ना आन्दोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल के  दिल्ली के सत्ता में आने के बाद से बहुत  सारे राजनीतिक  बदलाव आए हैं  जिसका असर पूरे  देश में दिखता  है उसी में एक बदलाव है होर्डिंग  की होड़, ये कितना जायज या कितना नाजायज  ये  भी एक चर्चा का महत्वपूर्ण विषय हो सकता है |

पहले के चुनाव विशेषतौर पर व्यक्तिकेन्द्रित  नहीं हुआ करते थी | पार्टी को सामने रखा जाता था, मैनिफेस्टो रखा जाता था आम भाषा में जिसमे चुनावी वायदे की ब्याख्या की जाती थी, लेकिन आज कल व्यक्तिकेन्द्रित राजनीति  करने का दौर चल रहा है, यह भी एक बदलाव है  जिसमे हर पार्टी नए-नए जुमलो के सहारे अपने मुख्य नेता को होर्डिंग  दिखाना ज्यादा पसंद करती है | उदाहरण  के रूप में ‘अबकी बार मोदी सरकार’ , ‘पांच साल केजरीवाल‘ , ‘बढ़ता रहे बिहार एक बार फिर से नितीश कुमार’ प्रमुख है | बिहार का चुनाव आने वाला है जिसमे दो जबरदस्त  गठबंधन वाले गुट  बन गए हैं , इसी होर्डिंग  की होड़ में एक बात नोट कीजिएगा ,  जो भी गठबंधन में छोटी पार्टिया है वो अपने गठबंधन के मुख्य पार्टी के नेता का नाम होडिंग में डालने को राजी नहीं हैं |

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उदाहरण के रूप में बीजेपी के साथ गठबंधन चुनाव लड़ रही रालोसपा के नेता उपेन्द्र कुशवाहा जी के बैनर पर आपको लिखा मिलेगा ‘अबकी बार  NDA सरकार’ ठीक उसी प्रकार लालू जी के बैनर पर आपको शायद ही कही नितीश जी का नाम मिले, फोटो सामूहिक रूप में जरूर मिल सकता है | आपको दिखा मिल सकता है ‘ना जुमलो वाली ना जुल्मी सरकार अबकी बार चाहिए आपको अपनी (गरीबों की) सरकार’ इसके अलावा  और भी कई जगह ऐसे उदाहरण  बड़े ही आसानी से देखने को मिल सकते हैं  |

इसी होर्डिंग  की होड़ में पार्टियों का मैनिफेस्टो कमजोर सा पड़ता दिखने लगता है | मैनिफेस्टो ही एक ऐसी चीज है जो आपको प्रदर्शित  करती है कि आपकी पार्टी कितने  पानी में है | हालाँकि अब मैनिफेस्टो में दिए गए वायदे महज ‘चुनावी जुमलो’ में परिवर्तित हो रहे है जिसे मात्र होमवर्क के रूप में तैयार किया जाता है , ठीक उसी तरह जैसे पहली या दूसरी कक्षा के विद्यार्थी अपना होमवर्क बस पूरा करने मात्र को लेकर करते है | सब अपनी बताई गई ट्रैक से भ्रमित होते नजर आ रहे है चाहे बात बीजेपी की हो या आम आदमी पार्टी की या फिर कोई और पार्टी ही क्यों ना हो |

होर्डिंग  का वर्चस्व  इतना बढ़ गया कि अरविन्द केजरीवाल ने अपने बजट में मुठ्ठी भर दिल्ली के लिए 525 करोड़ रुपया सिर्फ विज्ञापन के लिए रखने का फैसला तक कर लिया जो कि  उस राजनीति  को आज भी चुनौती दे रहा है जिसके लिए उन्होंने महज 20 करोड़ रूपये  में चुनाव  लड़ने  का दावा किया था | यहीं नहीं आज कल होर्डिंग  के माध्यम से एक पार्टी का दूसरे  पार्टी या संगठन से संवाद भी चल रहा है उदाहरण के लिए, दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने होर्डिंग  लगाया था कि ‘प्रधानमंत्री सर, प्लीज ! दिल्ली सरकार को काम करने दीजिए, दिल्ली सरकार अच्छा काम कर रही है’ उसके जवाब में भगत सिंह क्रांति सेना की तरफ से उसी तरह लगवाया ‘केजरीवाल सर, प्लीज ! आप इन 525 करोड़ के पोस्टर के बजाए 15 लाख के कैमरे लगवा दीजिये , दिल्ली में अपराध ख़त्म हो जाएगा’ यह भी एक राजनीतिक  बदलाव  शायद ही पहले किसी ने नहीं देखा हो |

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सभी राजनीतिक पार्टियों का अपना-अपना कंसर्न रहता है इस होर्डिंग को लेकर, जैसे यूँ  कहिए अगर मोदी सरकार ने चुनाव के दौरान, अख़बार के पूरा का पूरा पहला पन्ना विज्ञापनों से भर दिया हो या दिल्ली के हर बस स्टैंड पर  ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का विज्ञापन लगा हो तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस या अन्य पार्टियाँ अपनी हर रैली में, इस विषय के सन्दर्भ  में  जनता के पैसों  के  दुरूपयोग के रूप में व्याख्या  करने हेतु कुछ समय देती ही रही है | ठीक उसी तरह आज भाजपा के नेता और समर्थक भी केजरीवाल के होर्डिंग को लेकर, जनता के पैसो के  दुरूपयोग के रूप में देख रहे है जो कि  जायज भी है क्यूंकि  उन्होंने भी कुछ ऐसा ही देखा था | लेकिन जैसे ही मेरा मन, ‘मन की बात की ओर’ जाता है तब ये सवाल मेरे दिल में उठता है कि अरविन्द केजरीवाल के रेडियो एड  को लेकर लोग क्यों खफा रहते है | क्युकी दोनों प्रोग्राम का उदेश्य एक है चाहे केजरीवाल का रेडियो एड  हो या फिर मोदी जी की ‘मन की बात’ |

अब बात करते है कि कितना जरूरी है ये होर्डिंग ? अक्सर होर्डिंग के पक्ष में एक उत्तर आता है दिल्ली सरकार की तरफ से, कि मीडिया उनके कामों  का प्रचार-प्रसार नहीं करती है | खैर , एक बार उनकी बात मान भी ली गई, लेकिन दिल्ली जैसे शहर में जहाँ इन्टरनेट की पहुँच  बढ़िया हो, उनका ‘मोहल्ला सभा’ का मॉडल सक्रिय  रूप से काम कर रहा हो , नुक्कड़ नाटक की संभावनाएं  अच्छी हैं , छात्र नेताओं  की भी अच्छी-खासी फ़ौज हो वहाँ 525 करोड़ का क्या मतलब निकलता है ? दिल्ली के आकार को ध्यान में रखते हुए सिर्फ विज्ञापन पर खर्च करने के नजरिए से अमाउंट कुछ ज्यादा है |

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पटना के चौक पर चले जाइए, दिल्ली के बस स्टैंड, या  मेट्रो सब-के-सब जगह केवल प्रिंटिंग पेपर्स और बैनर्स से भरे हुए है ये सब उसी देश में हो रहा है जहाँ पर लगभग 33 लाख एनजीओ, दूसरे लफ़्ज़ों  में प्रत्येक 600 व्यक्ति पर लगभग एक एनजीओ है जो गरीब बच्चो के लिए प्रिंटेड किताब मुहैया करवाने के लिए प्रयासरत रहते है जो बच्चे खरीदने में असमर्थ रहते है | किसने क्या किया, क्या नहीं किया उसको दिखाने का कोई मतलब नहीं है क्यूंकि  जब कुछ अच्छा होगा तब जनता तक बिन बताए वो बाते पहुँच  जाएगी | जनता को सिर्फ आउटपुट से मतलब है उसे नहीं जानना कि आपकी कोडिंग क्या है या फिर आपकी जीडीपी क्या होता है उसे बस सेवा से मतलब है |

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