भारत में किसानन के खेती छोड़े के मूल कारण (भोजपुरी)

जब छोट रही महज चौथी-पंची कक्षा में, त हरेक स्वतंत्रता दिवस प एगो गीत बड़ा मशहूर रहे| ‘मेरे देश की धरती उगले हिरा मोती.. मेरे देश की धरती’| अउरी जब भी परीक्षा में आवत रहे किसान प लेख लिखे के त पहिला वाक्य इहे लिखत रही कि हमनी के किसान देश में पेट पालेला| लेकिन आज अईसन का हो रहल बा जवना से पेट पाले वाला पालनहार लोग जे हमनी के देश के धरती से हिरा उगलवावत रहे ओकरे पेट पालल मुश्किल हो गईल बा| हमनी के देश कृषि प्रधान देश कहाला लेकिन एहिजा कृषि के दशा संतोषजनक नईखे रह गईल| किसानन के समस्या दिनों दिन गंभीर हो रहल बा|

किसानन के समस्या के प्रभाव काफी आशचर्यजनक पड़ रहल बा| हरियाणा के जाट आन्दोलन से एकर अंदाजा लगावल जा सकेला कि किसानन के हार कतना खतरनाक रूप ले रहल बा| हम अभी भी एह बात के लेके आश्चर्य में बानी कि किसानी समस्या भी हिंसक रूप ले सकेला| इहे ना एह समस्या से बाकी के सामाजिक पैमाना जईसे आरक्षण वेग्रह भी काफी बुरी तरह से प्रभावित हो रहल बा, काहे कि लोग ओही के हल के रूप में देखे के भूल करे लागत बा| अगर सही समय प एकर हल ना निकालल गईल त आवे वाला समय में देश में काफी दिक्कत अउरी नुकसान झेले के पड़ सकत बा|

लोग किसानी काहे छोड़ रहल बा ?

सालों से इ एगो बड़ा ही अहम अउरी जरूरी सवाल रहल बा| एकर एगो बड़ा ही सरल उत्तर आवत रहल बा कि खेती में बचत नइखे एह से लोग किसानी छोड़ रहल बा| लेकिन ओह बचत ना होखे के मूल कारन का रहल बा, एह के भी जानल काफी जरूरी बा| बचत के एकदम सीधा फार्मूला खोजल जाव त एकर मतलब इहे होई कि बचत=विक्रय-लागत| एहिजा दुगो बात निकल के सामने आवत बा| पहिला इ कि लागत के मुकाबला में विक्रय काफी कमजोर होखे या दूसरा विक्रय ठीक होखत बा लेकिन लागत बहूत ज्यादा आ रहल बा| एह दुनो स्तिथि में बचत प्रभावित होई| दुर्भाग्यपूर्ण हमनी के इहाँ दुनो कारन रहल बा|

कवनो चीज के प्रोडक्शन होला त ओकर दाम ओही कंपनी के लोग करेला| लेकिन खेती के क्षेत्र में एकदम उल्टा बा| एहिजा किसान के प्रोडक्शन यानी धान गेहूं आदि के दाम सरकार तय करेले| एकरा के न्यूनतम समर्थक मूल्य कहल जाला| हम एह बात के बिल्कुल नकारत नइखे कि इ गलत चीज बा| लेकिन एकर उपयोग ओह मूताबिक नइखे हो पावत जवना मुताबिक खातिर लावल गईल रहे| अच्छा चीज बा सरकार के तरफ से किसानन खातिर एगो सिक्यूरिटी मिलेला| हम इहो नइखे कहत कि सरकार न्यूनतम मूल्य बहूत बढ़ा देव काहे कि हम जानत बानी कि आज भी डब्लू.टी.ओ. में विकासशील देशन प बहूत दबाव रहेला|

सरकार जब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य डिक्लेअर करेले तब कुछ फैक्टर प ध्यान देके ही करेले जईसे डिमांड आ सप्लाई, उत्पादन में मूल्य, लागत मूल्य में बदलाव, अंतराष्ट्रीय मूल्य के स्तिथि, बाजार के मूल्य के स्तिथि| एह सब के नजर में रखके एगो न्यूनतम मूल्य के रूप में गारंटी देवेले, जवना से अगर कवनो दिक्कत होखे त सरकार के भी घाटा मत होखे| एकर माने इ कि ओकरा से भी अच्छा कीमत किसान के ओकरा पैदावार प मिल सकत बा आ मिले के संभावना निश्चित बा| लेकिन दुर्भाग्यवश ओकरा से बढ़िया दाम मिले के त बात छोड़ी जवन न्यूनतम कीमत बा उहो ना मिल पावेला|

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एकर जवाबदेही सरकार ना कर पावेले जवन कि एगो बड कमी बा| उदहारण के रूप में सरकारी डाटा के हिसाब के 2014-2015 में धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य रहे 1360 रुपया प्रति क्विंटल| लेकिन व्यापारी 1000 रुपया प्रति क्विंटल तक के दर प भी गाँव से खीच के ले गईल बाड़े| एकरा में कवनो शक के बात नइखे उपरी स्तर पर पहुचत-पहुचत दर न्यूतम समर्थन मूल्य पार कर जाला| लेकिन ओह पार के दर अउरी कम दाम में लुटे वाला दर के अंतर वाला पईसा के माजा मिडिल मैन ही मारेले जेकरा के व्यापारी कहल जाला| एह लोग प सरकार के कवनो सीधा नियंत्रण नइखे| एकदम ऐंठ में कहेला लोग देवे के बा त दिही ना त घरे स्टोर करी|

किसान के लगे भंडारण के भी गंभीर समस्या रहल बा जवना के चलते मजबूर होखे जवने कीमत मिलेला ओही प बेच देला| मान ली जवन मझोला स्तर के किसान बा उ घर में कहाँ रखी| मान ली कुछ एक किसान के पास जगह बडलो बा त कीड़ा-मकोड़ा आ सडन-गलन के सम्भावना के डरे बेच के हटावल ज्यादा मुनासिब समझेला| एकरा अलावां पैक्स के लोग आनाज ख़रीदे तक से मना कर देवेला| हमेशा पईसा के दिक्कत के रोआ-रोहट ओह लोग के लागले रहेला| पैक्स के तरफ से कवनो गारंटी ना रहेला कि कब लिही कब ना लिही| जब उ लिही तक तक आनाज का खरिहानी में धराई| सरकार के लगे भी भंडारण के भीषण कमी रहल बा|

भंडारण के क्षेत्र में 100% एफडीआई बा लेकिन एकरा बावजूद आजो हालत पातर बा| कुछ लोग के आनाज पैक्स लेवे के तईयार भी होले त ओह में आपन कमीशन मांगेले| उदारण के रूप में जईसे सरकार 2014-2015 में धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य रहे 1360 रुपया प्रति क्विंटल रखले बा| एकर माने सरकार एह कीमत प किसानन से अनाज पैक्स के माध्यम से खरीदी| लेकिन पैक्स में बईठल नेता आ बाबु लोग कहेला कि चलs तोहरा के व्यापारी लोग के मुकाबले अच्छा कीमत मिल जाई 1200 रुपया प्रति क्विंटल देब लेकिन कागज बानी 1360 के हिसाब से|

एह सब के झमेला से बचे के चक्कर में किसान प्राइवेट व्यापारी के बेचे प मजबूर बा| प्राइवेट व्यापारी के बचे में तनाव कम, समय से पईसा, फटाफट आनाज हटे के गारंटी रहेला| भले कीमत कम मिले लेकिन बहूत सारा टेंशन ना रहेला| अगर अउरी माइक्रोस्कोपिक रूप से देखल जाव त पता चली कि व्यापारी अउरी पैक्स के बीचे भी एगो बरियार समीकरण बा| जहाँ से घोल माल अक्सर होत रहल बा| अब बात कईल जाव दुसरका फैक्टर दने| इ बात त तय बा कि ज्यादातर किसान आजो उचित कीमत प आपन अनाज नइखन बेच पावत| दूसरका इ कि आज के वर्तमान समय में जतना लागत होखे के चाही ओह से ज्यादा लागत लाग रहल बा|

ओकरा पीछे भी बरियार राजनीती रहल बा| खाद, बीज आदि प जवन सब्सिडी दिआला उ ग्राउंड लेवल प नइखे मिल पावत| एह से होला का कि ज्यादातर किसान या त बहूत महंगा कीमत प बीज आ खाद ख़रीदे खातिर साहूकार से पईसा लेला या फिर जवना बेगर काम चल सकेला ओकरा के इग्नोर कर देला| जे महंगा कीमत प खरीदेला उ ब्याज तले दबल रहेला| आ जे खरिदबे ना करे ओकर फसल अच्छा ना हो पावेला| दुनो ही दशा में देश के आ व्यक्तिविशेष किसान के भी घाटा होला| अंत में जब मिलावेला त पावेला कि खेती में फायदा नइखे छोडले ठीक बा|

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बाजार में चलत घोल माल के अलावां एगो अउरी बरियार समस्या रहल बा किसान लोगन में उ इ कि किसान संगठित नइखे| जहाँ भी किसान संगठित होखे के प्रयास कईले बाड़े उनका के या कुचल देवल गईल बा या फिर संगठन राजनितिक रूप अख्तियार कर लेले बा| उदाहरन ले लिही उत्तरप्रदेश के मेरठ वाला इलाका खेती के लिहाजा से काफी संगठित क्षेत्र रहल रहे जब ओहिजा किसानन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत जईसन लोग रहे| ओह घरी किसान संगठन में हिन्दू मुस्लिम सब रहले| ओह लोह के पहिला पहचान किसानी नेता रहे बाद में बाकी धर्म वेग्रह|

लेकिन मुजफरनगर जईसन दंगा ना सिर्फ ओहिजा के किसान एकता तुरलस बल्कि किसानन के ताकत के बाँट देहलस| दूसरा चीज इहो होला कि ज्यादातर किसान के नेता जईसे नेता लेखा लुउके लागेले ओहिजा राजनितिक नेतान के नजर पड़ेला| राजनितिक नेता या त पईसा प ख़रीदे के प्रयास करेले या फिर चुनावी टिकट के टॉस उछाल के अपना पाला में करे के प्रयास करेले| एह से होला का कि जवन ठोस सवाल जवाब करेके रहेला सरकार के उ ना हो पावेला| एगो राजनितिक स्टैंड लेला| एगो बढ़िया नेतृत्व के कमी के वजह के किसानन के ना त सही दाम मिल पावत बा फसल के आ नाही सही कीमत प इनपुट्स|

कृषि प जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अउरी सरकारी भूमिका 

अगर ऊपर देवल चुनौती से किसान संघर्ष करके आगे भी बढ़त बा त जलवायु के आगे आके आपन घुटना टेके प मजबूर हो जात बा| जलवायु अनिश्चित हो गईल बा आ एकरा प कोई के नियंत्रण भी नइखे| अलनीनो संकट हमेशा से बनत रहल बा| जलवायु परिवर्तन, कृषि के प्रभावित करे के क्षमता राखत बा| कृषि प तापमान परिवर्तन और नमी क्षेत्रन में परिवर्तन के प्रभाव गंभीर रूप से परेला| कृषि ग्लोबल वार्मिंग के कम भी कर सकेला अउरी एह स्थिति के अउर बदतर भी बना सकेला| बरसात समय से पाहिले दस्तक दे रहल बा अउरी पाहिले से तय मानसून के समय में सुखा के स्तिथि उत्पन्न हो रहल बा|

एक तरफ बारिस से बाढ़ के स्थिति बन रहल बा त दूसरा तरफ किसान आसमान दने टकटकी लगाये बारिस के बूंदन के इंतजार कर रहल बा| खेत में खडा फसल सूख रहल बिया| जलवायु परिवर्तन से खेती के तहस नहस हो जाला| ज्यादातर किसान के सरकारी बैंक से ऋण ना मिल पावेला| ओकरा पीछे भी कारण रहेला| ज्यादातर बैक आपन धन किसानन के देवल भी ना चाहेले| एकरा पीछे कारन इ बा कि ओकरा में ओह लोग के घाटा आ रिस्क रहेला| दउड-धुप आ पेपर वर्क जईसन जटिलता के चलते किसान निजी साहूकार से लोन लेवे प मजबूर हो जाला| जवना प नियंत्रण ना त आर.बी.आई. के बा आ ना सरकार के|

एकरा परिणामस्वरूप होला का कि फसल मरईला के बादो कर्ज देवे प किसान मजबूर रहेला| जवन मध्यम वर्ग के किसान बा उ आपन कुछ परंपरागत जमीन बेचे प मजबूर होला| एह से ओकर जोत छोट होखत चलल चल जाला| आ न्यूनताम वर्ग के किसान में परिवर्तित होखत चलल चल जाला| आ जवन न्यूनतम वर्ग के किसान बा उ दबाव बर्दाश ना कर पावेला त ओकर एगो रूप किसान आत्महत्या के रूप में देखे के मिलेला| अब सवाल इ बा कि आखिर एह सब से कईसे पार पावल जा सकेला| एगो हमार करीबी मित्र बानी कॉलेज में, शुभम श्याम, एक दिन उहाँ से बात होत रहे कृषि अउरी किसान आत्महत्या के विषय के लेके त उहाँ के एगो सुझाव हमरा बड़ा निक लागल|

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उहाँ के कहनाम रहे कि जईसे हमनी के देश में प्रधानमंत्री जी फाइनेंसियल इन्क्लूजन के बढ़ावा दे रहल बानी| एकरा खातिर बैंकिंग बेहद जरूरी बा| अगर बैंकिंग के एक्सेसिबिलिटी गाँव गाँव तक हो जात बा त जवन भी बैंक के लाइसेंस देवल जाव ओह लोग खातिर एगो शर्त रखल जाव कि कर्ज जवन बा उ किसान के मत मिलो बल्कि फसल के मिलो आ किसान ओह में मध्यस्ता बनस| अगर फसल के कवनो क्षति जईसे अतिवृष्टि, सूखा, ओलावृष्टि, आग, बाढ़ चाहे कवनो अउरी अन्य कारण होखे त ओह किसान के ओकर क्लेम तत्काल देवल जाव आ ब्याज के पईसन के माफ़ करे के प्रावधान होखे|

लेकिन पिछला कुछ साल में शाखा प्रबंधन क्षेत्र में रघुराम राजन, आर.बी.आई. के गवर्नर, के तरफ से कुछ बढ़िया कदम उठावल गईल बा| बैंक में लाइसेंस देवे में कृषि के लोन देवे तक के अनिवार्यता के शर्त रखे के बात कईल गईल बा| एकरा अलावां सबसे ज्यादा बैंक ग्रामीण क्षेत्र में खोले खातिर आवाहन कईले बाड़े जवन कि तारीफ ए काबिल बा| एकरा अलावां सरकार लगातार डब्लू.टी.ओ. में आपन बात रख रहल बिया जवना से पीस क्लॉज़ के परमानेंट समाधान निकालल जा सके| हालाँकि विकसित देश हमेशा से विकासशील देश प एह बात के दबाव बनावत आइल बा कि ट्रेड फैसिलिटेशन अग्रीमेंट प सारा देश राजी करे लेकिन भारत हमेशा मना करत आइल बा| खाली भारत ही ना बल्कि जी33 के तेतीस देश एकरा खिलाफ बा| चुकी एह में दिक्कत इ रहल बा देश के कुल पैदावार के 10% ही सब्सिडी के रूप में देवल जाला ओकरा के ख़त्म करे के मांग कईल जा रहल बा| जबकि भारत के किसानन के हित में नइखे| ओकरा पीछे कारन बा कि भारत सरकार फ़ूड सिक्यूरिटी कानून जईसन चीज से बंधल बा|

जहाँ एह बात के तय कईल गईल बा सरकार पी.डी.एस. अउरी सब्सिडी के अलावां के गरीब तबका के लोगन खातिर काफी कम दाम में अनाज मुहैया करवाई| ओकरा अलावां पी.डी.एस में भी सरकार के काफी कुछ देवे के पडला| एकरा अलावां न्यूनतम समर्थन मूल्य अउरी इनपुट्स जईसे खाद बीज आ इलेक्ट्रिसिटी आदि प सब्सिडी के रूप में कुछ राशी देवे के रहेला| दूसरा बात इ कि देश के कुल पैदावार के 10% ही सब्सिडी के रूप में दिआला आ उहो 1986-88 के मूल्यन के आधार प जवना के अगर आज के मूल्य के रूप में निकालल जाव त महज दू या तीन प्रतिशत निकली| एह इ निर्णय निकालल जा सकत बा कि किसानन खातिर सरकार के ना सिर्फ राष्ट्रिय स्तर बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर प भी संघर्ष करे के जरूरत बा|

नोट :- इ लेख ‘आखर’ पत्रिका के मार्च अंक में छप चुकल बा|

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