एकता जातिगत या धार्मिक नहीं बल्कि वर्गीक हो

अभी हाल ही में उत्तरप्रदेश में तनाव और हिंसा का माहौल बना हुआ था| राजनितिक नजरिए से लोग यह मान सकते है कि इस या उस सरकार की वजह से हो रही है| मेरा मानना थोडा अलग है| कोई भी सरकार ऐसी चीजों का बढ़ावा नहीं दे सकती, खासकर तब जब वह सत्ता में हो| मै यह भी नहीं कहूँगा कि इसमें विपक्ष द्वारा प्रायोजित चीजें है| सच तो यह है कि ऐसी घटनाएँ उत्तरप्रदेश में आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से हमेशा होते आए है| चाहे अलीगढ हो, सहारनपुर हो, मुजफ्फरनगर हो, आजमगढ़ हो, मैनपुर हो या कोई और जगह क्यूँ न हो| आदित्ययोगीनाथ तो अब आए है|

सबकी सरकारें बनी है| कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा सबकी सरकार पहले बन चुकी है| लेकिन किसी से यह काबू हो नहीं पाया है| अब सवाल यह है कि ऐसी चीजों के हल के रूप में अब भी हमें राजनितिक गलियारा में झांकना कितना जायज है? जब किसी ख़ास दवाई से मर्ज का इलाज हो ही नहीं रहा है तो हम बार बार क्यों उससे ही लेकर सबकुछ ख़त्म होने जाने की उम्मीद करते है| मै जहाँ तक सोचता हूँ इसका राजनीती कारण है ही नहीं| इसका कारण कहीं और छिपा हुआ है|

अक्सर यह देखा और सुना जाता है कि तमाम मजहब के लोग अपने मजहब की हिफाजत के नाम पर लोगों को इकठ्ठे होने की बातें करते है| यहीं नहीं मजहब के अन्दर भी जाती नामक खाचा बटा हुआ है| जातिवादी लोग जात के नाम पर इकठ्ठा होने की बातें करते है| मुस्लिम समाज में भी ऐसे ही खांचे शिया सुन्नी के नाम पर बटा हुआ है| ऐसे ही तमाम मजहब में भी चीजें है जो एक दुसरे को अपने आप से अलग पहचान बनाने के लिए, अलग स्थान प्रस्तुत करते है|

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अगर आज सोशल साइट्स पर देखा जाए तो अनेकों ऐसे ग्रुप मिलेंगे जो जाती और धर्म के नाम पर एक होने की बातें करते है| ब्राम्हण एकता, राजपूत एकता, भूमिहार एकता, जाट एकता, गुर्जर एकता, यादव एकता आदि आदि| इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि “एकता” के कांसेप्ट को मै ठुकरा रहा हूँ| एकता बहुत जरूरी है| लेकिन इस पैमाने पर नहीं| मेरा मानना है कि लोगों को जाती के नाम पर नहीं वर्ग और राष्ट्र के नाम पर इकठ्ठा होनी चाहिए| लेकिन ध्यान रहे राष्ट्र की एकता में जाती या धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए|

सारे किसानों को एक होने चाहिए जैसे आज जाती है, सारे मजदूरों को एक होना चाहिए, सारे डॉक्टर, इंजिनियर, ऑटो वाला, स्ट्रीट वेंडर्स आदि को अपनी अलग प्रकार की एकता बनानी चाहिए| बाबासाहेब डॉ भीम राव आंबेडकर भी दलितों को एक करने के लिए आवाहन करते थे| मै उनके इस विचार से भी अलग अपनी राय रखता हूँ| जैसे वो अपने जाती वाले को इकठ्ठे होने की बातें करते है वैसे ही अगर कोई अन्य उच्च जाती का व्यक्ति अपनी जाती के लोगों को इकठ्ठा होने की बातें करते है तो वो जातिवादी और यही बातें करने वाला दलित संघर्षशील कैसे हो सकता है? हमें किसी का तुष्टिकरण नहीं करनी चाहिए|

जाती, धर्म के नाम पर इकठ्ठा होने में बहुत सारीं समस्याएँ है| पहली और सबसे बड़ी समस्या है कि असली चुनौतियों से अझोला रहता है| बेसक घर में खाने को घर में रोटी दाल नहीं है, लेकिन जब जाती या धर्म की बात आए तो लठ लेकर मर मिटने को तैयार हो जाता है| बदलते समय को एह्साह कर पाने में लोग सक्षम नहीं होते है जब भी वह जातिवादी वाले पैमाने पर इकठ्ठे होते है|

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दूसरी बड़ी समस्या यह है कि जाती के नाम पर इकठ्ठा होना समाज को तोड़ता है और अपने समाज के अन्दर एक दुसरे को हीन भावना से देखने लगता है| अपने आप को सुपीरियर साबित करने वाला उच्च जाती दुसरे के ऊपर डोमिनेंट होने लगता है| यह समूह जो अपने आपको ताकतवर मानता है और धर्म पर अपना पहला हक़ जमाता है| सिर्फ धर्म ही नहीं बल्कि देश के हर संसाधन पर अपना पहला हक़ ज़माने की कोशिश करता है जिसे सामान्यतः ब्राम्हणवाद कहा जाता है| यह शब्द किसी धर्म से संबंधित नहीं है ठीक वैसे ही जैसे ‘पीटर इंग्लैंड’ कपडे के ब्रैंड का ताल्लुक इंग्लैंड से नहीं है|

बस नाम किसी खास धर्म से जुड़ा लगता है लेकिन इस समूह में सिर्फ वह ही नहीं बल्कि तमाम जो जातियां है जो अपने आप को उच्च दिखाने की कोशिश करती है| यह समूह की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वो जन्म से ही मान लेता है कि बाक़ी के छोटी जातियां उसके जूते की नोख पर है| और सबका कल्याण करने के लिए भगवान ने उसे ही धरती पर भेजा है| अगर ऐसा नहीं होता तो आप छोटी छोटी बातों पर ऐसे समूह के लोगों को उत्तेजित होते देख लेना|

यही दिक्कत मुस्लिम समाज में सुन्नी लोगों के साथ भी है वो शिया को मुसलमान मानते ही नहीं है| बड़े ही अलग नजर से दखते है| इसके अलावां तीसरी दिक्कत यह है कि हमारे देश की राजनीती का आधार यही जाती और धर्म है| कहने को लोकतान्त्रिक मात्र है, वोट तो जाती और धर्म पर आकर अंत में गीर ही जाता है| वैसे बहुमत तो नार्थ कोरिया वाला तानाशाह भी पाता है| वो अकेले खड़ा होता है| किसी भी कीमत पर सबको वोट डालना ही होता है|

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नहीं तो मरवा देता है| उसके लोकतंत्र में तो वोट प्रतिशत भी लगभग 100 प्रतिशत है और विशाल जनादेश भी वहां की जनता देती है| क्या उसे लोकतंत्र कह सकते है? आखिर उसे भी तो जनता ने ही चुना है| ऐसे ही हमारे देश की राजनितिक चुनाव और उसके परिणाम तब तक लोकतांत्रिक नहीं हो सकते जब तक जाती और धर्म का जगह ख़त्म नहीं हो सकता| इसे ख़त्म करने के लिए लोगों को वर्ग के आधार पर लामबंद होना ही काफी है|

जब वर्ग के आधार पर लामबंद होंगे तो किसी पुलिस वाले को हिम्मत नहीं होगी कि पराठे बेचने वाले स्ट्रीट वेंडर्स से हप्ता वसूले, किसी सरकार को यह हिम्मत नहीं होगी कि वो किसानों और उसकी समस्याओं पर अपनी चुप्पी साधे| इसकी खूबसूरती यह होगी कि सरकारें जीतने के बाद वो तमाम वर्ग के लिए जवाबदेही होगी| वर्ग के नाम पर होने वाली एकता हक़ और हुकुक की बातें करेंगी जहाँ धर्म और जाती की जगह नहीं होगी| जब जाती और धर्म होगी नहीं तो धर्म या जाती के नाम पर राजनीती होने का तो सवाल भी पैदा नहीं होता|

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