खान-पान पर आत्मचिंतन जरूरी

3 दिसम्बर को मेरे परिवार में शादी थी| बारात में गाँव अमौरा गए थे| बाबुसाहेब लोग की शादी में मांसाहारी खाना, चिकेन, मटन और मछली बेहद मशहूर है| खाने का कुल 90% में यही बनता है बाद बाकी 10% ही शाकाहारी बनता होगा| इस खान-पान से इस बात का निष्कर्ष निकाला जाता है कि शादी कैसी थी| उनलोगों ने दो शिफ्ट में खाना खिलाया| पहली शिफ्ट में खाने के लिए शाकाहारी लोगो को आमंत्रित किया| इसमें खाने वाले लोगो की संख्या सिंगल डिजिट में थी, उनमे से एक मै भी था|

उनमे ज्यादातर लोग बाबाजी(पंडित जी) लोग थे| खिलाने वाले को यह लग रहा था कि सारे बाबाजी लोग ही बैठे है| उनमे से एक आकर मुझसे पूछा “बाबाजी अउरी कुछु चाही?” मैंने उन्हें देखा और मुस्कुरा के बोला “हम बाबुसाहेब हई”| खाना खाने के बाद मेरे पास आया और बोला कि मुझे लगा कि आप शाकाहारी खा रहे इसलिए बाबाजी होंगे|

समाज में लोगों ने खाना को भी नहीं छोड़ा| उसे भी जातिगत और धार्मिक आधार पर बाट दिया है ठीक वैसे ही जैसे हिंदी और उर्दू भाषा को क्रमशः हिन्दू और मुसलमानों के बीच बाट दिया है| अगर मुस खाता हो तो मुसहर, चिकेन-मटन खाता हो तो बाबुसाहेब ना तो साग सब्जी खाए तो बाबाजी| ना तो भाषा किसी धर्म की बपौती है और नाही खान-पान| मै खान-पान को दुसरे नजर से देखता हु| आज के सात साल पहले जब मै छोटा था सब (चिकेन, मटन, मछली, चिड़िया आदि) सब खाता था|

एकबार तो ऐसा हुआ पिताजी घर में भेंड के मांस ले आए थे और बोले कि मटन है| रात को बना सबने खाया अगले दिन सुबह पूछा कैसा रहा? हम सबने बोला बहुत बढ़िया| जब हकीकत बताई तो उल्टियाँ आनी शुरू हो गई| मेरी माँ शुरू से ही नहीं खाती थी| आज स्तिथि यह है कि मेरे घर में मेरे पिताजी को छोडके कोई भी मांसाहारी नहीं है|

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जिसकी इच्छा है वो खाए लेकिन इसे किसी धर्म और जाती का प्रतिक के रूप में न देखे| मै सोचता हूँ कि खान-पान समयनुसार बदलता रहता है| आदम जमाने में कुछ होता नहीं था खाने के लिए, इसलिए वो जानवरों को मार कर खाते थे| शुरुआत में तो कच्चे खाते थे| जब आग का अविष्कार हुआ तो पकाना शुरू किया| आज हमारे पास लाखो व्यंजन है खाने के लिए फिर क्यों हम हाड़-मांस में उलझे हुए है|

सिर्फ पूर्वांचल के खाने को देखे तो हजारों व्यंजन(ठेकुआ, लुचुई, लिट्टी-चोखा, बरी, फुलौरी, बजका, दाल के दुलहिन, कसार, बेलगरामी, खाजा, आदि..आदि..) है| पश्चिमी व्यंजन दिन दुगनी और रात चौगनी वृद्धि कर रही है| पिज्जा को ही उदहारण ले लीजिए कितने प्रकार आ चुके है| जब हमारे पास खाने में इतने सारे विकल्प मौजूद है तो हम क्यों हाड़-मांस के लिए हाय तौबा मचाते है| मेरा मानना है कि बदलते समय से हमें संवाद करना और आत्मअवलोकन करना चाहिए|

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